आम की ऊंची - ऊंची शाखों पर,
जब बाँधी जाती थी घास की , हाथ से बाटी हरी - हरी रस्सी,
नीचे दोनों सिरों को जोड़ कर बांधा जाता था एक नीम का,
मोटा सा डंडा या राखी जाती थी एक लकड़ी की पटली,
जिसके दोनों सिरों पर बनाया जाता वी का निशान, रस्सी में फ़साने के लिए,
और peng badhate लड़कियों और बच्चों के jhund,
asmaan को छूने की चाहत में thame हुए jhoole की रस्सी,
ooper asman से jhimir -jhimir करती, बालों को bhigoti ,
chhoti - chhoti boonden,
हवा में tairte korars गान, सावन को फ़िर से आने की dawat देते हुए,
menhdi से लाल hatheliyon पर sametti , dhalte sooraj की lalima,
समय angdaii लेते हुए पहुँच गया ikkeesveen सदी में और ,
समेत ले गया अपने साथ , आम की bagiyon के साथ , ऊंची -ऊंची shakhen ,
lahrate - balkhate joolon की uchaiyon को , menhdi की mahak अब band हो गयी polythin के पैकेट में ,
isiliye शायद अब नहीं thaharti किसी hatheli पर sooraj की lalima ,
न ही jhimir - jhimir करते हैं सावन के मद bhare megh ,
ऊंचे - ऊंचे peng शर्मा कर जाने कहाँ chhup गए ,
अब नहीं goonjte हैं सावन के koras मंद -मंद बहती hawaon के aanchal में
आह! कहाँ गए वो दिन जब सावन के jhoole दिल के karib से gujarte हुए चाँद छू कर ,
baadlon से बातें करके, अपने priyatam की ख़बर लाने की minnaten करती ,
aanchal में शर्म से duhari होती taruni , अपने लाल हुए gulabi chehre को aanchal में छुपा कर haule से muskura देती थी।
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